शनिवार, 8 फ़रवरी 2014

-------------" हमसफर"------------


तुम हमसफर क्या बनेजहाँ भर की खुशियाँहमार नसीब बन गयींजिदंगी फूलों की खुशबू की तरह हसीन ,साज पर छिड़ेसंगीत की तरह सुरीलीतितलीयों के पंखोंजितनी रंगीन बन गईउस पर तुम्हारी बेपनाहमोहब्बत हमारा नसीबबन गई.रात एक हसीन ख्बाब की तरह चाँद तारों सेसज गई.हवाओं में तुम्हारे प्यारकी खुशबू बिखर गईहम पर तुम्हारी मोहब्बत का नशाइस कदर छा गयाहमने खुदा को भीभुला दियाऔर तुम्हें अपना खुदाबना लियातुम्हारी चाहत ही हमारी इबादत बन गईतुम हमसफर क्या बनेजहाँ भर की खुशियाँहमारा नसीब बन गयीं
...राधा श्रोत्रिय"आशा"

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