गुरुवार, 3 अप्रैल 2014

***ईशवर का खेल​***
देख माटी के ढ़ेले की करतूत​,
भगवान भी था झल्लाया !
बोला पंच -तत्वों से निर्मित​,
मैंने मानव को बनाया !
नपे तुले साँचें मैं सबको,
एक सा था ढ़ाला !
माटी की इस काया मैं वो,
कितना भेद​-भाव भर लाया!
किसी ने बोयी फ़सल नफ़रत की,
किसी ने ईर्ष्या द्वेष उगाया !
किसी ने बोया प्यार मोहब्बत​,
मन का खेत खूब लहलहाया !
इंसान होकर भी उसने पर​,
इंसानियत को नहीं उगाया!
अच्छा था कि रिमोट अपना,
इंसान के हाथों नहीं थमाया!
जब-जब अपने रिमोट का बटन​,
भगवान ने हे दबाया !
भूला अपने घंमड़ को इंसान ,
ईश चरणों मै जा शीश नवाया!
ईशवर के खेल हैं बड़े न्यारे,
साइंटिस्ट रिसर्च कर-कर हारे,
इंसान की साँसों को जो बचा सके,
ऐसा यन्त्र न बना पाया कोई!
कितनी तरक्की विज्ञान की होई,
पर जीवन बचा न पाया कोई!
समस्त सृष्टि का वो रचियता,
उससे बड़ा न ज्ञानी कोई !
सब वेद समाये जिसमें,
जहाँ से शुरू हर खोज हुई!
ज्ञान भी वो विज्ञान भी वो,
कर्ता भी वो धर्ता भी वो !
इंसान के सारे तर्क​-वितर्क को,
पल मैं धाराशायी कर देता वो!
पर इंसान समझ न पाया,
तेरा मेरा अपना पराया !
 अमीर​-गरीब महल झोपड़ी,
जीवन उसमें उलझ गवाँया!
"आशा"भाग्य विधाता वो कहलाया,
फिर भी इंसान न समझ पाया !
देख माटी के ढ़ेले की करतूत​,
भगवान भी था झल्लाया !
...राधा श्रोत्रिय​"आशा"
४-०४-२०१४

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