------------किताब------
धूप में बैठ एक किताब ,
पढ़ते-पढ़ते न जाने,
कहाँ से ,तुम्हारी
याद आ गई !
और समीर की एक ,
लहर, मेरे तन-मन,
को सहला गई!
सालों से बंद ,
पडे दिल के तार ,
जिसकी धुन, मीठे दर्द की,
तरह ,कभी हमारी रूह ,
में समा गई थी, फिर ,
झंकृत हो गई !
जी चाह इन यादों को,
झटक दें !
पर बड़ी ही ढ़ीठ निकलीं,
उतनी ही और करीब ,
आ गयी .!
फिर से किताब के ,
पन्ने पलट ,उसमें,
रखे कागज में,
बसी तुम्हारी लिखावट !
और उनसे,
लिपटी, तुम्हारी बातें!
जो हमें,
बहुत अजीज थी!
अपनी उँगलियों की,
छुअन से ,
उन्हें महसूस करने की,
चाहत ,
रोक न पाये !
न जाने क्यों आँखें,
भर आयीं,
और शब्द धुँधला गये!
हमने किताब ,
बंद कर दी !
देखा तो,
शाम ढ़ल गई !
धूप में बैठ एक किताब
पढ़ते-पढ़ते न जाने
कहाँ से तुम्हारी
याद आ गई .
...राधा श्रोत्रिय"आशा"
धूप में बैठ एक किताब ,
पढ़ते-पढ़ते न जाने,
कहाँ से ,तुम्हारी
याद आ गई !
और समीर की एक ,
लहर, मेरे तन-मन,
को सहला गई!
सालों से बंद ,
पडे दिल के तार ,
जिसकी धुन, मीठे दर्द की,
तरह ,कभी हमारी रूह ,
में समा गई थी, फिर ,
झंकृत हो गई !
जी चाह इन यादों को,
झटक दें !
पर बड़ी ही ढ़ीठ निकलीं,
उतनी ही और करीब ,
आ गयी .!
फिर से किताब के ,
पन्ने पलट ,उसमें,
रखे कागज में,
बसी तुम्हारी लिखावट !
और उनसे,
लिपटी, तुम्हारी बातें!
जो हमें,
बहुत अजीज थी!
अपनी उँगलियों की,
छुअन से ,
उन्हें महसूस करने की,
चाहत ,
रोक न पाये !
न जाने क्यों आँखें,
भर आयीं,
और शब्द धुँधला गये!
हमने किताब ,
बंद कर दी !
देखा तो,
शाम ढ़ल गई !
धूप में बैठ एक किताब
पढ़ते-पढ़ते न जाने
कहाँ से तुम्हारी
याद आ गई .
...राधा श्रोत्रिय"आशा"
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