शुक्रवार, 6 जून 2014

नाम तुम्हारा

#******** नाम तुम्हारा *******#
जब भी बैठती हूँ,
कुछ लिखने!
जेहन मैं अकसर ,
उभर आता है, 
नाम तुम्हारा!
ढ़ल जाते हो ,
लब्ज़ों मैं 
मेरे अकसर,
तुम बनकर प्यार!
की कोशिश,
दिल को ,
समझाया भी 
बहुत!
 हो जाते मजबूर,
पर  हम !
मन के हाथों
 अकसर!
जिस्म मैं बहते,
लहू जैसे!
रच बस गये हो,
मुझमें तुम !
कितनी 
 तकलीफ़ देह,
होती है,
खुद मैं ,
खुद की खोज​!
अकसर भूल ,
वजूद अपना!
जेहन मैं अकसर ,
उभर आता है, 
नाम तुम्हारा!
आसाँन नहीं होता,
"आशा" देखो,
जिस्म से जाँन को,
जुदा करना!
जिनसे रूह के,
रिश्ते हो!
वो धडकन मैं,
रहा करते हैं!
...राधा श्रोत्रिय​"आशा"
६-०६-२०१४

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