बुधवार, 15 अक्टूबर 2014

* दिल **

******** दिल *********
हमने सोचा था कि तुमसे,
 झगड़ा कर लेंगे!
और तुमसे दूर होकर ,
तुम्हें भूल जायेंगें !
पर हमारी कोशिश नाकामयाब हो ग​ई,
न जानते थे दूर जाने कि कोशिश में,
दिल से तुम्हारे और करीब आ जायेंगे!
सोचा जेहन को तो अपने हिसाब से,
चला लेगें !
न जानते थे कि दिल को काबू में न ,
रख पायेंगें !
जितना दूर होना चाह ,
उतने करीब आ जायेंगे !
क्या करें क्या नहीं,
असमंज़स में हैं !
न जानते थे ,
जेहन​-और -दिल की जंग में ,
हम भी फ़ँस जायेंगे !
दिल की सुनते हैं,
तो जेहन में सवाल उठते हैं!
जेहन की सुने तो दिल से हार जायेंगे,
उफ़्फ़ ! न जानते थे कि दोनो के झगडे में,
हम इस कदर बेबस हो जायेंगे !
सोचा चलो दिल की ही सुनलें,
जेहन को तो मना ही लेंगे !
और आखिर जीत ,
तुम्हारी जिद की ही हुई!
हमें क्या पता था,
कि हम अपना दिल हार जायेंगे----
...राधा श्रोत्रिय​"आशा"

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