शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2014

******* रिश्ते **************
कितनी मुश्किल से बनते हैं रिश्ते,
अपने प्यार की छाँव में सहेजकर​!
अपनत्व की तपिश से सहलाकर​,
कोमल स्पर्श के एहसास में ,
पिरोकर​!
पलकों में ख्बाबों की तरह ,
 सजाकर​!
अपने प्यार,विशवाश और
 समर्पण की,डोर से,
 बाँधकर रखते हैं!
ताकि हर मौसम के असर से,
बेखबर रहें ये !
वक्त और हालात की आँधी,
 इन्हें डिगा न पाये !
कितनी मुश्किलों से बनते हैं रिश्ते,
एक पूरा जीवन इनको सहेजने में,
गुजर जाता है !
वहीं अविशवाश का ,
 एक झौंका इन्हें,
तिनका-तिनका बिखेर जाता है ,
चाहकर भी समेट नहीं पाते !
पलकों में ख्बाबों की तरह ,
सजाये रिश्ते !
पलको में गर्द की तरह ,
 जमकर रह जाते हैं ------------
...रधा श्रोत्रिय​"आशा"

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