शनिवार, 1 नवंबर 2014

दस्तक

******** दस्तक **********
सुबह -सबेरे दरवाजे पर ,
किसी ने दस्तक दी !
कुंडी खोली देखा ,
हैराँन हो गयी !
हवायें खुशबू में लबरेज़ ,
तुम्हारे प्यार का,
पैगाम ले आईं !
मेरे दिल की धड़कने ,
बेकाबू हो गयीं !
खुद पर मेरा काबू,
 न रहा !
तुम्हारे पैगाम ने मुझे,
इस कदर बैचेन कर दिया !
अगर सामने तुम आ जाते,
तो क्या होता !
...राधा श्रोत्रिय"आशा"

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें