शुक्रवार, 21 नवंबर 2014

किनारा

***********   किनारा *************
 इस कदर  गमों ने देखो छलनी मुझे किया है,
रोती हैं मेरी आँखें किनारा आँसूओं ने किया है!
घुट​-घुटकर, हाल दिल का, अब ये हो गया है,
कि ज़ख्मों ने भी, मरहम से, तौबा कर लिया है!
देखकर रंग ,लहू का अब ,ज़ख्म भी सिसकते हैं,
मज़हबियों ने, इंसानो में ,कितना, भेदभाव किया है!
जिंदा तो हैं ,देखो "आशा" ,कि जिंदगी, नहीं है ,
एक कवायद है,साँसों की, जो  अभी, थमी नहीं है!
न लवों पर दुआयें,न चेहरों पर खुशी है,
 अमन चैन कि बातें सुने,ज़माना गुज़र गया है!                
इस कदर  गमों ने देखो छलनी मुझे किया है,
रोती हैं मेरी आँखें किनारा आँसूओं ने किया है!
...राधा श्रोत्रिय​"आशा"
२२-११-२०१४ 

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