मंगलवार, 25 नवंबर 2014

आदमी

************ आदमी ***********
खुद में खुद को तलाशता हुआ,
हर आदमी !
बेतरतीब सा भाग रहा ,
धक्के खाता राशन की लाईनो में,
तो कभी बस में बैठने की खातिर,
न जाने कितने जतन कर ,
थककर बैठ !
फिर हिम्मत जुटाकर उठता हुआ,
हर आदमी !
इंसानों की भीड़ इस कदर ,
जैसे मेला लगा हो !
पर खुशी नहीं चेहरों पर​,
जीने की जद्दोजेहद में,
अपने होने पर सवाल उठाता हुआ,
और एक दिन बढ़ जाता ,
हर आदमी !
सवाल जस का तस​,
जवाव की उम्मीद,
बनाये रखती हो,इसका हौंसला शायद​---------
...राधा श्रोत्रिय​"आशा"
१७-११-२०१४

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