************ आदमी ***********
खुद में खुद को तलाशता हुआ,
हर आदमी !
बेतरतीब सा भाग रहा ,
धक्के खाता राशन की लाईनो में,
तो कभी बस में बैठने की खातिर,
न जाने कितने जतन कर ,
थककर बैठ !
फिर हिम्मत जुटाकर उठता हुआ,
हर आदमी !
इंसानों की भीड़ इस कदर ,
जैसे मेला लगा हो !
पर खुशी नहीं चेहरों पर,
जीने की जद्दोजेहद में,
अपने होने पर सवाल उठाता हुआ,
और एक दिन बढ़ जाता ,
हर आदमी !
सवाल जस का तस,
जवाव की उम्मीद,
बनाये रखती हो,इसका हौंसला शायद---------
...राधा श्रोत्रिय"आशा"
१७-११-२०१४
खुद में खुद को तलाशता हुआ,
हर आदमी !
बेतरतीब सा भाग रहा ,
धक्के खाता राशन की लाईनो में,
तो कभी बस में बैठने की खातिर,
न जाने कितने जतन कर ,
थककर बैठ !
फिर हिम्मत जुटाकर उठता हुआ,
हर आदमी !
इंसानों की भीड़ इस कदर ,
जैसे मेला लगा हो !
पर खुशी नहीं चेहरों पर,
जीने की जद्दोजेहद में,
अपने होने पर सवाल उठाता हुआ,
और एक दिन बढ़ जाता ,
हर आदमी !
सवाल जस का तस,
जवाव की उम्मीद,
बनाये रखती हो,इसका हौंसला शायद---------
...राधा श्रोत्रिय"आशा"
१७-११-२०१४
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