शनिवार, 1 नवंबर 2014

एक ख्याल

******* एक ख्याल **********
जाड़े की एक रात ,
मैं उनके ख्यालों में ,
खोयी हुई थी!
खामोशी की चादर ओढ़ ,
सो रहा था पूरा शहर!
पर नींद मेरी आँखों से ,
थी कोसों दूर !
प्यार में ड़ूबे उनके शब्द ,
खनक उठे मेरे कानों में !
मैंने खिड़की से बाहर झाँका ,
चाँद पहरे पर था !
निशा के आँचल में तारे,
झिल-मिला रहे थे !
ऐसे में चुपके से आकर ,
मेरा हाथ थाम ,
हौले से कानो में कुछ कहना!
और तुम्हारी साँसों की,
 नर्म छुअन से !
गालों का लाल हो जाना,
पलकों का शर्मा कर झुक जाना!
 लगा इस खामोश रात में ,
शहनाई गूँज उठी !
और तुम्हारी साँसों की आँच से,
धीरे-धीरे में पिघल रही थी !
...राधा श्रोत्रिय"आशा"

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