गुरुवार, 13 नवंबर 2014

********* नज़र **********
मैं तो जिधर देखती हूँ,
वो ही नजर,आते हैं मुझे!
किस राह पर ले आयी है,
मेरी बेखुदी मुझे !
जब उनसे नजरें मिलीं,
में मे न रही!
आँखें हैं उनकी,कुछ और नजर,
आता नहीं मुझे!
जरूरी नहीं कि हर ख्वाईश,
दिल की पूरी न हो!
ये अलग बात है,
 उनको इसकी खबर तक न हो!
भीगती रहीं रात भर ,
उनके इंतजार में मेरी आँखें!
जैसे चाँद के इंतजार में,
रात भर जागें हों तारे!
ये कैसा जादू उनकी,
 नजर का है "आशा"!
कि मेरी नजर भी अब ,
पहचानती नहीं मुझे!
...राधा श्रोत्रिय​"आशा" 

1 टिप्पणी: