रविवार, 9 फ़रवरी 2014

-------------"मोहब्बत" --------------


उफ़्फ ये कैसी मोहब्बत है तेरी
विरह की आग में तन-मन 
झुलसा देती है
फ़िर अपने प्यार की बरसात से
भिगो देती है
मेरे तन -मन को
सिहर उठती हूँ में
तेरे आने के एहसास भर से
निखर उठती हूँ में
कंपकपाने वाली सर्द रातों में
कँपकपाते होठों से बुदबुदा
उठती हूँ में काश!!!
कि तुम मेरे पास होते
तुम्हारे प्यार की तपिश
इस ठंड को बेअसर कर देती
रितुराज बसंत का आगमन
निखर उठी है प्रकृति
नयी-नयी कोपलें फ़ूट पड़ी
शबाब पर हैं फ़ूल
भँवरों की भी चाँदी है
रस पी- पीकर खूब इठला रहे हैं
भीनी-भीनी सी खुशबू हवाओं में
छायी हे
तुम्हारे आने की आहट
उन्हें भी है
उफ़्फ ये इतंजार क्यों???
हमारी नियती है
न जी पाती है
न मरती है "आशा"
उफ़्फ ये कैसी मोहब्बत है तेरी

...राधा श्रोत्रिय​"आशा"

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