रविवार, 9 फ़रवरी 2014

------------वक्त की सलाईयाँ-----------------

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वक्त की सलाईयों कोमजबूती से थाम रखा हैआज भी मैनेंलम्हा - लम्हा उन पर बुनना हैतुम्हारा भविष्य जिनमें लम्हा - लम्हा बुनी तुम्हारी गर्भ में होने कीपहली अनुभूतिजब डाक्टर के यहाँ से घर आने परमाँ ने तुम्हारे भाई को बोलाकोयल आने वाली हैऔर वो बडे आशचर्य से बोलानानी कौन है कोयलऔर माँ मुस्कुराकर बोलीतुम्हारी छोटी बहिन शायद माँ के पास जादू था कोईउन्हें सब पहले पता चल जाता थातुम्हें नहीं देख पाई वोमाँ की बात सुन खुश हो गई मैंलगा जैसे मेरी दुआ कुबूल हो गईउस सुखद अनुभूति को शब्दों मैंढ़ालना मेरे बस मैं नहींजैसे एक मासूम सपना मेरे भीतर अंगड़ाई ले रहा होमेनें वक्त से सलाईयाँ माँगी और लम्हों के फन्दे उसपे डालेएक -एक लम्हा बुनना शुरु कियाप्रकृति तुम्हें मेरे भीतर बुन रही थीऔर उस एहसास को में लम्हा -लम्हावक्त की सलाईयों में पिरो रही थीतुम्हारी हर मासूम आहट को महसूस करतीऔर उतने ही जतन से बुनतीजितने भी सपने मेरी आँखों ने सजायेअपनी लाडो के लियेमेनें इन्द्रधनुष से उसके रंग माँगेतुम्हारे लिये सतरंगी स्वेटर बुनने कोऔर वक्त की सलाईयों परबडे जतन से बुनासोचा उसे पहन सतरंगी फूल जेसेखिल उठोगी तुम एक -एक लम्हा बुनना शुरु कियाप्रकृति तुम्हें मेरे भीतर बुन रही थीऔर उस एहसास को में लम्हा -लम्हावक्त की सलाईयों में पिरो रही थीतुम्हारी हर मासूम आहट को महसूस करतीऔर उतने ही जतन से बुनतीजितने भी सपने मेरी आँखों ने सजायेअपनी लाडो के लियेमैनें इन्द्रधनुष से उसके रंग माँगेतुम्हारे लिये सतरंगी स्वेटर बुनने कोऔर वक्त की सलाईयों परबडे जतन से बुनासोचा उसे पहन सतरंगी फूल जेसेखिल उठोगी तुमवक्त अपनी गति से आगे बढ़ रहा थामैनें उसकी सलाईयों पर अपनी पकड़ बड़ी मजबूत रखी ताकि एक फंदा भीइधर-उधर न होलम्हा - लम्हा बढ़ रही थी तुमतुम्हारा पहली करवट लेनासुखद सा एहसास तुम्हारे पापा और मेने साथ संजोये थेसपनेनाम तुम्हारा हम दोनो ने चुनातुम्हारे भाई की भी रजामंदी थी"मिन्टी" मिन्ट जैसीलम्हा - लम्हा बुन रही थी मेंतुम्हारे आने की घड़ी नजदीक आ रही थीलम्हा - लम्हा बुन्ती तुम्हें देखने की चाहत वक्त की सलाईयों पर मेरी पकड़ और मजबूत बनातीआखिर वो लम्हा भी आ गया जिसके लिये जतन सेलम्हा - लम्हा बुनाबुने हुये सारे लम्हेंवक्त की सलाईयों के साथसंभाल कर रख दियेप्रकृति की बुनी रचना को जन्म देने वाली थी मैंतुम्हारी मधुर आवाज गूँज उठी मेरे कानो मैंप्रसव वेदना भूल गयी मैंलगा जैसे चाँदनी उतर आयी होतुम्हारे चेहरे मैंसूरज की रश्मियों की सुनहरी आभातुम्हारे बालों में समाहित हो गयीहिरनी सी चंचल तुम्हारी आँखेंनर्म ,नाजुक, कोमल सी ऊँगलियाँरंग जैसे दूध में गुलाब का रंग मिला होप्रकृति की इतनी खूबसूरत कृतिमेंने तुम्हे अपने आँचल में छुपा लियाकहीं किसी की नजर तुम्हे न लग जायेये सोच कभी तुम्हारे चेहरे को देखती कभी तुम्हारी तृष्णा तृप्त करतीऔर जब तुम अपनी नन्हींऊँगलियों का स्पर्श करतीनिहाल हो उठती मैंऐसा अलौकिक सुख जो एक माँ ही महसूस करती हैनीली परी की लोरी सुनाहल्की-हल्की थपकी दे तुम्हें सुलातीवक्त की सलाईयाँलम्हा- लम्हा बुन रही थीऔर तुम भी लम्हा - लम्हाबढ़ रही थीपहली बार जब तुम्हारे नन्हें कदम जमीं पर पडेतो तुम्हारी पायल की रुन-झुन सेपूरा घर गूँज उठाकभी में तुम्हारे बाल सँवारतीकभी तुम्हारी फरमाईशें पूरी करतीतुम्हारी हँसी से खिल उठते हमतुम अपने भाई से जिद करतीलम्हा - लम्हा बुनतेसाल दर साल बुनती चली गयीतुम्हारी चाहतें तुम्हारे सपनेतुम्हारी मीठी- मीठी बातेंलम्हा - लम्हावक्त की सलाईयों पे...राधा श्रोत्रिय"आशा"२-१-२०१४

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