सूरज की रश्मीयाँ हमारेगालों को छू-छूकर
तुम्हारे हाथों की तपिशका एहसास कराती है
हवा भी अब तुम्हारीआवाज में गुनगुनाती है
पंछियों की चहचहाहट तुम्हारेहोने का एहसास दिलाती है
दिल में दबी तुम्हारी यादों कीचिंगारी फिर सुलग जाती है
जेहन और दिल में फ़िर जंग सी छिड़ जाती है
...राधा श्रोत्रिय"आशा"
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