क़्यूँ तुम्हारी बातें मुझेइस तरह हैरत में डाल देती हेंमें सोचती रहती हूँ .खुद से भी पूछा मेनेकि आखिर तुमसे रिशता क्या हेक्यों तुम्हारी छोटी-छोटीसी बातों से हैऱान हो उठती हूँ में .भूल जाती हूँ सब कुछसिर्फ़ तुमको ही ख्बाबोंख्यालों में बुना करतीहूँ अक़सर .एक चिंग़ारी सी गुजर जाती हेमेरे जिस्म से होकरतिनकों का मेरा आशियाना हे.अग़र तुम आ जाओतो क्या हो....राधा श्रोत्रिय"आशा"
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