शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014

----------------"यादों का काफ़िला"--------------



बड़ी अजीब सी कशिश है इस शहर मेंजब भी आती हूँतुम्हारी यादों काकाफ़िला साथ चला आता हैयाद आते हैवो दिन और वोबातेंजब पहली बार तुमने मुझे गुलाबी सूट में देखातुम अपने होश खो बैठेमेरी हर बात पर तुम तारीफ़ों के पुल बाँधतेथेजब मेरी मुस्कान में तुम चाँद का अक्स देखते थेमेरे बालों को रेशम कहकर तुमहौले सेहवा में लहरा देतेथेजादुई सी लगती थीमेरी हँसी तुम्हेंमुझे हँसते देख तुम टकटकी लगाकर देखते थेन जानें किसकी नजर लगीशायद नजर ही थीहम अपनी आँखों सेअपने सपने उजड़तेदेख रहे थेजानती हूँवो दिन अब नहीं लोटेगेंआज सालों बाद इस शहर में आयी हूँतुम्हारे पसंद के गुलाबी सूट मेंनहीं जानती कि अब कभी हम मिलेंगे भी या नहींइस बड़े शहर केएक कोने मेंजहाँ हमारीयादें दफ़न हैंरोक न पायी खुद कोउन यादों से मिलने सेजहाँ की हवाओं मेंतुम्हारी खुशबू मौजूद हैखोजती हूँ में तुम्हेंतुम नहीं मिलतेपर तुम्हारी यादों में मेरी आँखों के मोती झरते हैंछोड़ आती हूँ उन्हें तुम्हारे लियेमेरी तरह शायद कभी तुम भीअपनी यादों की कब्र पे फ़ूल चढ़ाने आओ इस शहर मेंबड़ी अजीब सी कशिश है इस शहर में...राधा श्रोत्रिय"आशा"

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