काश की वक़्त के
ताले की चाबी
हमारे
हाथ मैं होती
तो उन
भूले
बिसरे पलों को
जो
हमारे
जेहन मैं
एक
मीठी
याद बनकर
कैद
हो गये हैं
वक़्त की
कैद से
आजाद कर
कुछ
लम्हें
उन मीठी
यादों के साथ
जी लेती
फ़िर उन्हें
वक़्त के द्वार से
अंदर
भेज
ताला
लगाकर
चाभी अपने ही
पास रख लेती
...राधा श्रोत्रिय"आशा"
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें