रविवार, 9 फ़रवरी 2014

---------------------"स्त्री" -------------------------------------


हमने तो जिसे भी चाहावहाँ सिर्फ़ धोखा ही मिला .जिसके लिये हमने अपनी हर खुशीहर चाहत तक कुर्वान कर दीपर बदले में सिर्फ़ धोखाही मिला .वो हमे समझ ही नहीं पायाहम उसकी खुशीखोजते रहेवो हमारी खुशीछीनता रहाहम उसे पूजते रहेवो हमे प्रताड़ित करता रहा.क्यों??????क्योंकि वो एक पुरुष हेइसलिये उसका अहं उसेउसकी गल्तीयों काएहसास नहीं होने देताया गल्तीयाँ करने कीइजाजत देता हे .क्या स्त्री होना हमाराकसूर हे????????या पुरुष की ज्यादतीबरदाशत करना .लगता हे कसूर हमाराही हे .पाषाण में इंसान तलाशने की कोशिशकी हे हमने .पर क्या पाषाण कभीपिघलता हे .अब हमें ही बदलना होगा अपनी खुशीऔर अधिकारों केलिये लड़ना होगाक्योंकि पुरुष नेहमारे त्याग,प्यार,औरसमर्पण को हमारीकमजोरी समझ लिया हेपर स्त्री होना कोई गुनाह नहीं स्त्री ने पुरुषों को सिर्फ़ दिया ही हे .बेटी,बहिन,पत्नि,माँ हर रूप में वो अपना सर्वस्व न्योछावरकरती आई हे और बदले मेंहमेशा अपमान और पीड़ाउसकी झोली में आये.जिस आँचल की छाँव तले वो एक पुरुष को पाल-पोषकरबड़ा करती हेउसी आँचल को पुरुष बार- बार दागदार करता आया हे.अब और नहीं स्त्री कमजोर नहींआज की स्त्री अपने अधिकारों केलिये लड़ना जानती हे ." में एक स्त्री हूँ"मुझसे हे मेरी पहचान माँ के रूप में,जननी,जन्मदात्री, सृजन करनेवाली .अगर में न हूँ तो क्या होगा इस संसार का???शायद पुरुष विहीन

...राधा श्रोत्रिय​"आशा"

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