रविवार, 9 फ़रवरी 2014

-----------------लम्हों के धागे----------------

जब भी कोई ख्याल दिल में आता हे
तुम्हारे होने का एहसास जगाता हेहम उस एहसास को लम्हों के धागोंमें ढ़ालकर वक्त की सलाईयों में पिरोलेते हे .और अपनी पलकों पे ख्बाब कीतरह हर लम्हें को सहेजते हेंकि कहीं कोई छूट न जायेलम्हों के धागों को बडे जतन सेसहेजकर लम्हा- लम्हा बुनते हेंकहीं आपस में उलझ न जायेइन्हें सुलझाना आसां नही जरासा हाथ क्या फिसला पारे केमाफ़िक बिखर जाते हें

...राधा श्रोत्रिय​"आशा"

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