जाड़े की एक रात मैंउनके ख्यालोंमें खोयी हुई थीखामोशी की चादरओढ़ सो रहा थापूरा शहरपर नींदमेरी आँखों सेथी कोसों दूरप्यार में ड़ूबेउनके शब्दखनक उठेमेरे कानों मेंमैंने खिड़की सेबाहर झाँकाचाँद पहरे पर थानिशा के आँचल मेंतारे झिल-मिलारहे थेऐसे में चुपके सेआकरमेरा हाथ थामहौले सेकानो मेंकुछ कहनाऔर तुम्हारीसाँसों कीनर्म छुअन सेगालों का लालहो जानापलकों का शर्माकरझुक जानालगा इस खामोशरात मेंशहनाई गूँज उठीऔर तुम्हारीसाँसों की आँच सेधीरे-धीरे मेंपिघल रही थी.......राधा श्रोत्रिय"आशा"
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें