आज फिर तेरी कमी सी है
जेहन -ओ -दिल
में जंग
छिड़ी सी है
गुजरता
हर लम्हा
बीते वक्त का
हिसाब
बयाँ करता है
पर आँखों में
आज भी तेरी
यादों की नमी
थमी सी है
जिन्हें चाहकर
भी हम
खुद से जुदा
न कर सके
तेरी वो यादें
हमारी रूह में
थमी सी हैं
बिखर रहे हैं
कतरा-कतरा
हम
जाँ
निकलने में
कुछ कमी सी
है
आती जाती
हर
साँस में
महक बीते
पलों की
बसी सी है
आज फिर तेरी कमी सी है
हसरत है
आँखों को मेरी
तेरे
दीदार की
ईंतजार में
तेरे
मेरी आँखें
खुली
सी हैं
आज फिर तेरी कमी सी है
.......राधा श्रोत्रिय"आशा"
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