शुक्रवार, 14 मार्च 2014

***कविता***

***कविता***
मैं सोच रही थी,
कविता कैसी होती है !
तभी एक नन्हीं-मुन्नी,
नाजुक सी बाला,
नन्हें-नन्हें पैरों से
दौड़ती मेरी और आई !
उसकी पायल की
रुन-झुन​,
पूरे वातावरन मैं
गूँज उठी !
जैसे कोई मधुर संगीत​,
बज उठा हो !
या किसी ने वीणा के,
तारों को
छेड़ दिया हो !
जब उसने अपना मुँह​,
बोलने के लिये
खोला !
तो मोती के मानिंद
चमकते
 उसके दो-तीन दाँत
 और उसमें से
प्रस्फुटित होते
कुछ ,
तुतलाते स्वर !
मानो मुझे शब्दों की,
अलौकिक
नगरी मैं ले गये !
हतप्रभ सी मैं,
अपलक उस नन्हीं
बाला को,
 निहारती रही !
क्योंकि इससे अच्छी,
शब्दों की अनुभूति
मुझे पहले कभी,
महसूस नहीं हुई !
फिर मेने सोचा,
शायद,
 ऐसी ही होती है
कविता !
...राधा श्रोत्रिय​"आशा"

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