गुरुवार, 20 मार्च 2014

***भावनाओं का मंथन***

***भावनाओं का मंथन***
मेरा मंथन जारी है,
किसी शिव के
 आने के इंतजार मैं!
जो समझ सके,
मेरे अंतस मैं उठते
भावनाओं के झंझावत को!
जब ये आँधी
लेगी एक भयावह रूप!
हो जायेगा तबाह सब,
न रहेगा कुछ शेष!
न रहेगी सत्ता,
न इसके गलियारे,
न ही इसके,
चूल्हों पर चढ़ी हाँडियां!
जहाँ पकता है,हर दिन
कुछ नया,
खदकता है!
आँच बनाये रखने के लिये,
झौंकते हैं,गरीब ,बेबस,
लाचारों के सपने,
छीन लेते हैं,
 उनके बच्चों के निवाले!
कुर्सियों की खातिर ,
जानवरों से भी बदतर हो,
चीखते,चिल्लाते हैं ये!
सत्ता के मद हो चूर,
दुहाईयाँ देते है,
उन वीरों की
कुरवानियों की!
उन शहीदों की
जो मिट गये,
देश की रक्षा की खातिर !
ड़र नहीं है इन्हें,
शहीदों की,
बेबाओं की आह का!
न उन वीर शहीदों की,
माओं का,
जिनकी कोखें उजड़ गयीं,
पथरा गयीं जिनकी आँखें,
जिंदा लाश
बन रह गयीं हैं जो!
ड़र नहीं है इन्हें हजारों,
बेबस लाचारों की पीड़ा का,
सो जाते हैं जो भूखे पेट​!
जो नहीं जुटा पाते हैं ,
अपनी औरतों के,
तन ढ़कने के कपड़े!
जिन पर गिद्ध दृष्टी ड़ालते,
सफेद कपड़ों मैं
 काला मन लिये,
 ये बडे लोग !
देकर कुछ पैसों का लालच,
खरीद लेते हैं उनकी
भूख,बेबसी,लाचारी,
अपनी हवस की खातिर​!
ड़र नहीं हैं इन्हें,
इन मुफ़लिसों की,
आह का!
क्या होगा उस दिन,
 जब ये आह मिल,
 एक होंगीं!
फटेगा एक ज्वालामुखी,
बहा ले जायेगा ये,
सत्ता के गलियारे,
 इठलाते हैं
जिस पर ये सारे!
फिर शिव​-शक्ति मिल करेंगे,
साफ सुथरी सी रचना!
पर कब आयेंगें वो शिव ?
कहाँ हैं उनकी शक्ति ?
जो समझ सकेंगे
मेरे अंतस मैं उठते
भावनाओं के झंझावत को!
...राधा श्रोत्रिय​"आशा"
२०-०३-२०१४

2 टिप्‍पणियां:

  1. "
    क्या होगा उस दिन,
    जब ये आह मिल,
    एक होंगीं!
    फटेगा एक ज्वालामुखी,
    बहा ले जायेगा ये,
    सत्ता के गलियारे,
    इठलाते हैं
    जिस पर ये सारे!"

    क्रन्तिकारी भावों से अंकित आपकी ये रचना,
    सम्मानित कवयित्री राधा जी,
    जरुर एक दिन क्रांति की विजय होगी!"

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