रविवार, 23 मार्च 2014

***आपाधापी***

    ***आपाधापी***
भागती दौड़ती रफ़्तार मैं,
जिंदगी की!!
कितना कुछ बेशकीमती,
बेहिसाब​,
छूट जाता है पीछे!!
उलझकर रह जाते हैं,
सुलझाने मैं जिंदगी के सवाल​!!
भुला बैठते हैं अपना,
मासूम बचपन​!!
माँ की मनुहार​,
पिता का दुलार​!!
छोटी-छोटी बातों पर​,
भाई,बहिनों से की तकरार!!
फिर मिलजुलकर की ग​ई,
किसी न​ई खुरापात की इज़ाद!!
वो स्कूल के दिनों की मस्ती,
पढ़ाइ के साथ की हुई,
प्यारी शरारतें!!
टीचर की ड़ाँट और घर मैं,
माँ के डंड़ों की बरसात​!!
गाँड प्राँमिस लास्ट टाइम​,
माँ पर खत्म होती  हर बात!!
युवावस्था की खट्टी-मीठी,
 कुछ छुई-अनछुई सी यादें!!
वो चेहरा जो उभरा जेहन मैं,
बनकर पहला प्यार​!!
वो काँलेज के दिन,
 और दोस्तों का साथ​!!
पढ़ाई के साथ कैंटीन मैं,
गुजारे लम्हात,
भुलाये से न भुलाई जाती,
जिनकी याद​!!
वो नेवी की क्लास ,
और लेट होने पर मास्टर​-चीफ,
की फटकार!!
केम्पों के दिनों की मस्ती,
हल्की गुलाबी जाड़े की रातें,
खुले आसमान के नीचे
घंटों दोस्तों से की हुई बातें!!
याद आ जातें हैं आज भी,
वो बीते हुए पल​!!
न किसी बात की चिन्ता,
न कल की थी कोई फ़िकर​!!
कैद हैं मन के किसी कोने मैं,
आज की उलझनो मैं,
छिड़ी किसी पुरानी बातों पर​!!
जब कभी याद आ जाते हैं वो ,
भूले बिसरे पल!!
खिल उठता है चेहरा,
फ़िर से कुछ पल​!!
भागती दौड़ती रफ़्तार मैं,
जिंदगी की!!
...राधा श्रोत्रिय​"आशा"
२४-०३-२०१४

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