मंगलवार, 25 मार्च 2014

**कैक्टस​***

        ***कैक्टस​***
कभी- कभी तन -मन इतना,
बोझिल हो जाता है !
कि खुद को संभालना बहुत ,
मुशकिल हो जाता है!
मन करता है ,
छोड दें ढ़ेर हो जाने दे खुद को!
पर चारों तरफ हजारों कैक्टस ,
बिखरे हुये नजर आते है!
हारकर अपना बोझ समेट तन​,
मन को संभालने मैं लग जाता है!
...राधा श्रोत्रिय​"आशा"

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