रविवार, 9 मार्च 2014

***यकींन​***


बहुत चाहा था
तुम्हे हमने,
यकींन था,
खुद से ज्यादा
अपनी चाहत पर!
पर तुम्हें पाकर​,
खोना
दिल को गवारा,
न था!
इसलिये
 माँगा नहीं,
तुम्हें हमने अपने,
रब से!
बहुत चाहा था
तुम्हे हमने!
...राधा श्रोत्रिय​"आशा"
७-०३-२०१५

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें