अचानक एक दिन
रास्ते मैं,
वो मुझसे टकरा गया !
आँखों से आँखे मिली,
न जाने कितने
गिले शिकवे,
जख्म बन कर,
रिस रहे थे जो,
सालों से दिल मैं,
आँखों से बह निकले !
जल्दी से आँखें पोंछी
उसकी आँखों से
झलकती लाचारी
और बेइंतहा मुहब्बत,
मुझसे न छिप सकी !
उसने आँँखें चुरा ली,
और मैं भी
आगे बढ़ गयी !
उसके जाने के बाद,
दिल मैं उमडते,
जज्बातों के सैलाब को,
रोकना
मुशकिल हो गया !
न जाने कैसे ,
सालों से बंद,
आँसुओं का
दरिया बह निकला !
मैं उसे टूटकर बिखरते,
देख रही थी !
पर मेरे हाथ समय की,
रस्सी ने बाँध दिये थे !
अचानक एक दिन,
रास्ते मैं
वो मुझसे टकरा गया !
...राधा श्रोत्रिय"आशा"
८-०३-२०१४
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