सुबह आस्माँ मैं फैली,
सिंदूरी आभा !
अनछुई, कोमल,
नर्म -नाजुक सी,
बहती मद-मस्त बयार !
अपनी मस्ती मैं,
उड़ान भरते पंक्षी !
उदित होने को,
लालायित भास्कर!
ऐसा प्रतीत होता है,
जैसे आकाश के
माथे पे,
किसी ने सिंदूरी,
बिंदिया जड़ दी हो!
...राधा श्रोत्रिय"आशा"
९-०३-२०१४
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