तन्हाई मैं अकसर,
सोचा करते हैं तुम्हें !
वो हौले-हौले,
तुम्हारा मुस्कुराना !
कुछ न कहकर भी,
तुम्हारी आँखों का,
सब कुछ कह जाना !
पर खामोश रहीं,
हमारी आँखें !
खोजते हैं हम,
इन आँखों की
खामोशी मैं,
तुम्हारी वो मुस्कुराहट !
जो कहीं गहरे,
दफ़न है
हमारी खामोश,
आँखों मैं !
तन्हाई मैं अकसर,
सोचा करते हैं तुम्हें !
...राधा श्रोत्रिय"आशा"
८-०३-२०१४
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