शुक्रवार, 28 मार्च 2014

इम्तहान

***इम्तहान ***

क्यूँ इस तरह तुम हमारा,
इम्तहान लेते हो!!
ये विरह-वेदना अब हमसे,
सही नहीं जाती!!
तुम्हारे वियोग मैं,
हम हँसना भूल गये हैं!!
भूख .प्यास तो ,
हमें नहीं सताती!!
पर तुम्हारी याद रह - रहकर,
आती रहती हैं!!
जिससे हमारी साँसों की ,
की निरंतरता बनी हुई हैं!!
प्यार क्या हैं ?
ये तो हमें नहीं पता!!
पर तुम्हें याद न करें,
ये तो हमसे नहीं,
हो सकता!!
चाहत क्या हैं ?
ये भी हम नहीं जानते
पर तुम्हें भुलादें ये भी हमसे,
हो नहीं सकता!!
तुम्हारी यादों की डोर टूटे
उससे पहले.......
...राधा श्रोत्रिय"आशा"

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