शुक्रवार, 28 मार्च 2014

*ओम -साँई*

***ओम -साँई***
तुमको बुलाते हम शिरडी के बाबा,
कोई हमारी नहीं सुन पाता!
तेरे द्वार पे आकर साँई,
शीश मैं नवाऊँ !
तेरे चरणों की,
मैं धूल बन जाऊँ!
तुमको बुलाते हम शिरडी के बाबा,
कोई हमारी नहीं सुन पाता!
अश्रुओं का है जल ,
मेरी श्रद्धा,
ही सुमन है!
मन ही है दीपक,
भक्ती रस मैं,
बाती बटी है!
तुमको बुलाते हम शिरडी के बाबा,
कोई हमारी नहीं सुन पाता!
तुम बिन दूजा कोई,
जग मैं नाहीं!
कर-कर कोशिश,
सबमें हारी!
विनती सुन लो,
अब साँई हमारी !
तुमसे ही आशा,
उम्मीद भी तुम्हारी !
तुमको बुलाते हम शिरडी के बाबा,
कोई हमारी नहीं सुन पाता!
...राधा श्रोत्रिय"आशा"
२७-०३-२०१४

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