मंगलवार, 13 मई 2014

आँखें

***** आँखें *****
तुम्हारी यादों के,
भँवरजाल मैं!
कुछ इस तरह ,
हम ,
खो जाते हैं!
कि ,
बाहर निकलने के,
सब रास्ते !
बंद
नज़र आते हैं!
बहुत
कोशिश की,
कि तुम्हारी यादों से,
बाहर ,
निकल जाते हैं!
पर ,
हर मोड़ पर
तुम्हारी
आँखों के,
पहरे नज़र आते हैं!
...राधा श्रोत्रिय​"आशा"

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