सोमवार, 12 मई 2014

स्त्री

***##***स्त्री  ***##***
मैं स्त्री,
पुरूष के ,
अंह तले दबी हुई!
फिर भी,
उसकी चाहत की,
आस में!
समेटती हुई,
अपने वजूद को!
माँ बनकर​,
संपूर्ण होने के,
एहसास से!
अपने खूँ,
पसीने से रिश्तों को,
सींचती हुई!
अपने सपनो में,
पंख लगा,
नित नयी उड़ान
भरती हुई!
ऊँचा उड़ाने की,
चाह में,
अपने बच्चों को!
खुद को भूल,
एक माँ दूर​,
हर रिश्ते से!
एक दिन अचानक​,
एक एहसास​!
"स्त्री"
इन सबसे परे,
न होना,
अपना वजूद​!
झंझोड़ता सा हुआ,
अंतर्मन को!
संतृप्त होकर भी,
एहसास​,
असंतृप्त होने का!
मैं स्त्री,
पुरुष से मेरी,
पहचान​!
क्यों ???
मेरा अपना,
वजूद नहीं!
...राधा श्रोत्रिय​"आशा"

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