मंगलवार, 27 मई 2014

एक नयी उम्मीद

#***** एक नयी उम्मीद *****#
ज्येष्ठ की एक वीरान दोपहर,
गृहस्थ और पंक्षी जब ,
आराम फ़रमाते!
आमजन सारे काम धन्धों ,
के बीच रुककर,
सहसा,भयानक,
निर्जन मूर्त धारण करते!
डरकर पंक्षी भी,छुप जाते,
घोंसलों मैं!
ऐसे मैं मूक प्रकृति ,
दूसरी मूक आशा!
एक दूर तक फैली हुई धूप मैं,
एक वृक्ष  की छाँव मैं!
आमने-सामने बैठी हुई,
विरह -वेदना से जलती हुई!
एक शख्स ने किया दुस्साहस,
इस नीरवता को भंग करने का!
अपने प्यार मैं पगा हुआ,
खत भेजकर,
दोनो ही तमतमा उठी!
उसने अपने प्यार की,
बरसात से,
दोनो को तृप्त कर दिया!
खुश होकर,
लहलहा उठी प्रकृति,
ओढ़ ली हरियाली की चूनर!
पंक्षी भी घोंसलों से,
पंख फड फडाकर, 
निकल आये बाहर !
आमजन अपने-अपने काम पर,
लौट गये!
"आशा "खिलखिला उठी,
एक नयी उम्मीद के साथ!
...राधा श्रोत्रिय"आशा"   
२६-०५-२०१४

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