बुधवार, 14 मई 2014

प्रकृति से प्यार- पवित्र पावन सा एहसास

#*****# प्रकृति से प्यार- पवित्र पावन सा एहसास #*****#

सर्द मौसम की पहली बर्फ़ हो बिखरी,
 जाड़ो मैं खिली गुलाबी धूप हो!

गरमियों मैं सुबह की मद-मस्त बयार,
बारिश कि हो पहली फ़ुहार!

मस्जिद से आती अज़ान,
मंदिर से आती घंटियों की झंकार!

भोर अंधेरे अलसाते हुऐ उठना,
परिंदो का अपने-अपने घोंसलों,
से उड़ान भरना!

आसमान मैं फैली हल्की- हल्की,
लालिमा!

हौले -हौले से पत्तों का हिलना,
मुस्कुराते हुऐ कलियों का,
खिलना!

तितलियों भँवरों का फ़ूलों पर,
मँड़राना !

नन्हें मुन्ने की तुतलाती सी आवाज,
नन्ही लाड़ली की पायलों की,
 रुन -झुन!

पेड़ों से झन-झन उतरती हुई धूप,
कुहू-कुहू करती कोयल की कूक!

कुदरत का खजाना है कितना भरपूर,
जितना चाहों लो पर पर कम नहीं,
होता!

रात के अंधेरों से लड़ उन्हें हरा,
कितना कुछ ले आती है ये सुबह!

कितना ही गहरा हो अंधेरा पर रोशनी से ,
हारना ही पड़ता है !

मंद-मंद मुस्कुराते सूर्यदेव सबके लिये प्यार,
भरा रोशनी का पैगाम ले आते हैं!

सबको रोशन करने के लिये खुद को दिन,
भर तपाते हैं!

और फिर सिंदूरी आभा लिये शाम के आँचल,
मैं छुप जाते हैं!

एक नयी लालिमा के साथ एक नयी सुबह ,
के इंतजार मैं!

प्रकृति से प्यार- पवित्र पावन सा एहसास है,
जो सिर्फ इंसान को देती है निस्वार्थ!

...राधा श्रोत्रिय"आशा"

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