##****##***# मेरे कान्हा #***##****##
मेरे कान्हा............
कैसी लीला है आपकी! एक तरफ तो सारी दुनियाँ ,
आपके नाम का गुन - गान करती है!कि जन्मते ही,
आपके माता- पिता कंस की कैद से आजाद हो गये थे!
पर आज आप कहाँ हो....
आज के इन कंसों का संहार कौन करेगा......
जिन्होने हर इंसाँन का जीना दूभर ....
कर दिया है.......जिनकी वजह से मँहगाई.....
सुरसा कि भाँति मूँह फाड़ रही हे....
गरीब के मूँह से रोटी का निवाला.....
छिन गया है...हाड़ फोड़ मेहनत कर भी.....
दो जून की रोटी नहीं जुटा पाता....वो तुम्हें...
माखन - मिश्री का भोग कहाँ से लगाये....
जिसके बाल - गोपाल भूख से बिल -बिलाते है....
दूध मैं तिगुना पानी मिला उनकी भूख मिटाता है....
वो केसे तुम्हारी सेवा करे ....
मेरे कान्हा........
तुम तो जानते हो भूखे भजन न होये गोपाला.....
जब अंतड़िया भूख से कुलबुलाती हैं....
वो नाम तुम्हारा ही जपता है.. पर तुम्हारा....
हृदय द्रवित नहीं होता...क्यों ???
मेरे कान्हा..........
बोलो न....कुछ बोलते क्यों नहीं तुम...
या तुम भी उन बड़े लोगों की भक्ती से....
प्रसन्न हो जो मूँह मैं राम और बगल मैं......
छुरी रखते हैं....इश्वर तो सर्व व्यापी है....
कण कण मैं बसता है...अनमोल है.....
तुम तो किसी के हाथ नहीं बिक सकते....
किसी पद या सत्ता मैं स्थान पाने की....
खातिर ..दूर हो न तुम तो इन सियासी....
चालों से या.....तुम भी....बदल रहे हो...
मेरे कान्हा .......
बोलो न...कुछ तो कहो .मेरे सवालों के जबाब ......
कोन देगा.....
परेशाँ है आज हर आम इंसाँन अपना घर चलाना....
मुशकिल है.....देश के ठेकेदार अपनी ढ़पली अपना....
राग अलाप रहे हैं.....सब अपने फायदे की राजनीती....
कर रहे हैं....मुफलिसों,दलितों को सपने बेच रहे हैं...
धर्म के नाम पर सियासी दाव - पेंच खेल रहे हैं....
मेरे कान्हा........
धर्म के संस्थापक हो तुम.....और तुम्हारी आँखों के आगे...
धज्जीयाँ उड़ रही हैं धर्म की......
क्यों चुप हो...क्या फिर किसी महाभारत को....
अंजाम देने की सोच रहे हो.......
या इस देश की बदहाली पर कहीं बैठ....
बाँसुरी बजा रहे हो...
या भारत माता की आबरू पर हो रहे....
अत्याचार के खिलाफ़ बदला लेने की.....
साज़िश रच रहे हो.....
हे गिरधारी, हे मन मोहना....
तुम तो मोहिनी विद्या मैं पारंगत हो...
तो क्यों नहीं इस देश के दुशमनों पर......
उसका प्रयोग करते......
देश की बहिन बेटियों की आबरू खतरे में है आज.....
द्रोपदी की लाज बचाने तो आप आये और चीर-हरण से.....
बचा लिया...पर देश की बहिन बेटियों की लाज कौन बचायेगा.....
मेरे कन्हा......
कब आओगे तुम ....आज की नारी अपने ही घर मैं सुरक्षित नहीं....
नकाब है आज हर चेहरे पर...बहुत मुश्किल है पहचानना....
कि कोन है अपना....या अपना ही शत्रु है.....
जब तक हमारी बेटियाँ घर नहीं लौट आती हैं...
सुकुन से नहीं रह पाती हैं माँये....स्मरण तुम्हारा ही....
करते हैं कान्हा..कि तुम उनके साथ रहो....कुदृष्टी से ....
उन्हें बचाओ...
मेरे कान्हा..........
आपने जननी बनाकर जिस नारी का मान बढ़ाया....
पुरुष को जन्म देने बाली नारी,आज उसके द्वारा ही,,,
अपमानित हो रही है!आखिर क्यों???
उसके बोलने से लेकर उसके पहनावे तक पर ........
पुरूषों की हुकुमत है...जिसे पहनना बोलना,उसने सिखाया....
अगर उनका बस चले तो वो औरत की साँसों पर भी...
अपना पहरा लगा दें....क्यों ???
समाज के नीयम कायदे,कानून सिर्फ़ औरतों के लिये हैं.....
पुरूषों के लिये क्यों नहीं,,,,
दोनो एक ही समाज का हिस्सा हैं.....
फिर भेदभाव क्यों ???
पता नहीं लोग जानवरों को जानवर क्यों कह्ते हैं...
शायद शिक्षित नहीं...
पर सामाजिक और व्यवहारिक ज्ञान उनमें इंसान के....
मुकावले कहीं ज्यादा है..
जिसकी रोटी खाते हैं...वफ़ादारी निभाते हैं....
आखरी साँस तक.....
मेरे कान्हा.......
इंसाँन मै ये गुण देना कैसे भूल गये तुम....
या इसमें भी स्वार्थ था तुम्हारा....
जानते थे कि जन्मदात्रि का जो नहीं...
वो तुम्हें क्या पुछेगा...शायद यही ड़र रहा होगा....
या तुम्हें भी इंसान को गढ़ने के बाद पता लगा....
कि भूल से तुमने इंसान के गुण जानवरों में ड़ाल दिये.....
इसलिये वो वफ़ादार है.....
पर कहलाता जानवर है.....
पर इंसान .....होकर भी इंसान वफ़ादार न हो सका...
जानवर से भी बदतर हो गया.....
हमारे समाज में मर्यादा पुरूषोत्तम राम को तो पूजा जाता है.....
पर उनके आदर्शों का पालन नहीं किया जाता......
उन्होने तो एक पत्नी धर्म निभाया.....पर यहाँ तो अपनी छोड़....
पराई पर दृष्टी जरूर ड़ालेगें...एक से ज्यादा ब्याह रचायेंगे...
दूसरों की बहिन बेटीयों पर उँगली उठायेंगे...
भूल जाते हें बाकि की चार खुद पर ही उठ रही हैं.....
मेरे कान्हा............
पुरूष खुद को प्रभु राम की तरह क्यों नहीं बनाते...
जब उनके नाम पर राजनीती कर सकते हैं....
तो उनका आचरण क्यों नहीं अपना लेते...
सारी समस्यायें स्वतः समाप्त हो जायेंगीं...
फ़िर हर स्त्री में अपनी बहिन बेटी नजर आयेगी....
उसके वस्त्रों पर दृष्टी नहीं जायेगी,सारा खेल सोच का है...
अगर वो बदल जायेगी.....तो विचारों में शुद्धता आ जायेगी....
और आये दिन घट रहीं गैंग रेप , और बलात्कार की घटनायें....
समाप्त हो जायेंगी .....जिस राम का नारा लगाकर सियासत .....
कर रहें हैं.......वास्तव मैं ऐसे समाज की स्थापना हो पायेगी.....
मेरे कान्हा.........
सुन रहे हो न तुम..आज देश की हर बहिन बेटी तुम्हें पुकार रही है....
अब धर्म की रक्षा की खातिर तुम्हें आना ही होगा......
मेरे कान्हा...........
मेने ये लेख देश के मौजूदा हालातों को देख मेरे मन मैं....
जो भाव उत्तपन्न हुये ....देश की नागरिक होने के नाते...
वो मेनें लिखे..किसी का अपमान करना या ठेस पहुँचाना....
मेरा मकसद नहीं....इस देश के कानून ने हमें ........
मत देने का अधिकार दिया है.....तो हमारे लिये देश हित ...
सर्वोपरि है...और यही हमें यह सब सोचने के लिये विवश...
करता हैं......जय हिन्द.....जय भारत....
...राधा श्रोत्रिय"आशा"
14-05-2014
मेरे कान्हा............
कैसी लीला है आपकी! एक तरफ तो सारी दुनियाँ ,
आपके नाम का गुन - गान करती है!कि जन्मते ही,
आपके माता- पिता कंस की कैद से आजाद हो गये थे!
पर आज आप कहाँ हो....
आज के इन कंसों का संहार कौन करेगा......
जिन्होने हर इंसाँन का जीना दूभर ....
कर दिया है.......जिनकी वजह से मँहगाई.....
सुरसा कि भाँति मूँह फाड़ रही हे....
गरीब के मूँह से रोटी का निवाला.....
छिन गया है...हाड़ फोड़ मेहनत कर भी.....
दो जून की रोटी नहीं जुटा पाता....वो तुम्हें...
माखन - मिश्री का भोग कहाँ से लगाये....
जिसके बाल - गोपाल भूख से बिल -बिलाते है....
दूध मैं तिगुना पानी मिला उनकी भूख मिटाता है....
वो केसे तुम्हारी सेवा करे ....
मेरे कान्हा........
तुम तो जानते हो भूखे भजन न होये गोपाला.....
जब अंतड़िया भूख से कुलबुलाती हैं....
वो नाम तुम्हारा ही जपता है.. पर तुम्हारा....
हृदय द्रवित नहीं होता...क्यों ???
मेरे कान्हा..........
बोलो न....कुछ बोलते क्यों नहीं तुम...
या तुम भी उन बड़े लोगों की भक्ती से....
प्रसन्न हो जो मूँह मैं राम और बगल मैं......
छुरी रखते हैं....इश्वर तो सर्व व्यापी है....
कण कण मैं बसता है...अनमोल है.....
तुम तो किसी के हाथ नहीं बिक सकते....
किसी पद या सत्ता मैं स्थान पाने की....
खातिर ..दूर हो न तुम तो इन सियासी....
चालों से या.....तुम भी....बदल रहे हो...
मेरे कान्हा .......
बोलो न...कुछ तो कहो .मेरे सवालों के जबाब ......
कोन देगा.....
परेशाँ है आज हर आम इंसाँन अपना घर चलाना....
मुशकिल है.....देश के ठेकेदार अपनी ढ़पली अपना....
राग अलाप रहे हैं.....सब अपने फायदे की राजनीती....
कर रहे हैं....मुफलिसों,दलितों को सपने बेच रहे हैं...
धर्म के नाम पर सियासी दाव - पेंच खेल रहे हैं....
मेरे कान्हा........
धर्म के संस्थापक हो तुम.....और तुम्हारी आँखों के आगे...
धज्जीयाँ उड़ रही हैं धर्म की......
क्यों चुप हो...क्या फिर किसी महाभारत को....
अंजाम देने की सोच रहे हो.......
या इस देश की बदहाली पर कहीं बैठ....
बाँसुरी बजा रहे हो...
या भारत माता की आबरू पर हो रहे....
अत्याचार के खिलाफ़ बदला लेने की.....
साज़िश रच रहे हो.....
हे गिरधारी, हे मन मोहना....
तुम तो मोहिनी विद्या मैं पारंगत हो...
तो क्यों नहीं इस देश के दुशमनों पर......
उसका प्रयोग करते......
देश की बहिन बेटियों की आबरू खतरे में है आज.....
द्रोपदी की लाज बचाने तो आप आये और चीर-हरण से.....
बचा लिया...पर देश की बहिन बेटियों की लाज कौन बचायेगा.....
मेरे कन्हा......
कब आओगे तुम ....आज की नारी अपने ही घर मैं सुरक्षित नहीं....
नकाब है आज हर चेहरे पर...बहुत मुश्किल है पहचानना....
कि कोन है अपना....या अपना ही शत्रु है.....
जब तक हमारी बेटियाँ घर नहीं लौट आती हैं...
सुकुन से नहीं रह पाती हैं माँये....स्मरण तुम्हारा ही....
करते हैं कान्हा..कि तुम उनके साथ रहो....कुदृष्टी से ....
उन्हें बचाओ...
मेरे कान्हा..........
आपने जननी बनाकर जिस नारी का मान बढ़ाया....
पुरुष को जन्म देने बाली नारी,आज उसके द्वारा ही,,,
अपमानित हो रही है!आखिर क्यों???
उसके बोलने से लेकर उसके पहनावे तक पर ........
पुरूषों की हुकुमत है...जिसे पहनना बोलना,उसने सिखाया....
अगर उनका बस चले तो वो औरत की साँसों पर भी...
अपना पहरा लगा दें....क्यों ???
समाज के नीयम कायदे,कानून सिर्फ़ औरतों के लिये हैं.....
पुरूषों के लिये क्यों नहीं,,,,
दोनो एक ही समाज का हिस्सा हैं.....
फिर भेदभाव क्यों ???
पता नहीं लोग जानवरों को जानवर क्यों कह्ते हैं...
शायद शिक्षित नहीं...
पर सामाजिक और व्यवहारिक ज्ञान उनमें इंसान के....
मुकावले कहीं ज्यादा है..
जिसकी रोटी खाते हैं...वफ़ादारी निभाते हैं....
आखरी साँस तक.....
मेरे कान्हा.......
इंसाँन मै ये गुण देना कैसे भूल गये तुम....
या इसमें भी स्वार्थ था तुम्हारा....
जानते थे कि जन्मदात्रि का जो नहीं...
वो तुम्हें क्या पुछेगा...शायद यही ड़र रहा होगा....
या तुम्हें भी इंसान को गढ़ने के बाद पता लगा....
कि भूल से तुमने इंसान के गुण जानवरों में ड़ाल दिये.....
इसलिये वो वफ़ादार है.....
पर कहलाता जानवर है.....
पर इंसान .....होकर भी इंसान वफ़ादार न हो सका...
जानवर से भी बदतर हो गया.....
हमारे समाज में मर्यादा पुरूषोत्तम राम को तो पूजा जाता है.....
पर उनके आदर्शों का पालन नहीं किया जाता......
उन्होने तो एक पत्नी धर्म निभाया.....पर यहाँ तो अपनी छोड़....
पराई पर दृष्टी जरूर ड़ालेगें...एक से ज्यादा ब्याह रचायेंगे...
दूसरों की बहिन बेटीयों पर उँगली उठायेंगे...
भूल जाते हें बाकि की चार खुद पर ही उठ रही हैं.....
मेरे कान्हा............
पुरूष खुद को प्रभु राम की तरह क्यों नहीं बनाते...
जब उनके नाम पर राजनीती कर सकते हैं....
तो उनका आचरण क्यों नहीं अपना लेते...
सारी समस्यायें स्वतः समाप्त हो जायेंगीं...
फ़िर हर स्त्री में अपनी बहिन बेटी नजर आयेगी....
उसके वस्त्रों पर दृष्टी नहीं जायेगी,सारा खेल सोच का है...
अगर वो बदल जायेगी.....तो विचारों में शुद्धता आ जायेगी....
और आये दिन घट रहीं गैंग रेप , और बलात्कार की घटनायें....
समाप्त हो जायेंगी .....जिस राम का नारा लगाकर सियासत .....
कर रहें हैं.......वास्तव मैं ऐसे समाज की स्थापना हो पायेगी.....
मेरे कान्हा.........
सुन रहे हो न तुम..आज देश की हर बहिन बेटी तुम्हें पुकार रही है....
अब धर्म की रक्षा की खातिर तुम्हें आना ही होगा......
मेरे कान्हा...........
मेने ये लेख देश के मौजूदा हालातों को देख मेरे मन मैं....
जो भाव उत्तपन्न हुये ....देश की नागरिक होने के नाते...
वो मेनें लिखे..किसी का अपमान करना या ठेस पहुँचाना....
मेरा मकसद नहीं....इस देश के कानून ने हमें ........
मत देने का अधिकार दिया है.....तो हमारे लिये देश हित ...
सर्वोपरि है...और यही हमें यह सब सोचने के लिये विवश...
करता हैं......जय हिन्द.....जय भारत....
...राधा श्रोत्रिय"आशा"
14-05-2014
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