रविवार, 22 जून 2014

ख्बाब

***** ख्बाब ***** आज फिर एक और साँझ, तुम्हारे इंतजार , मैं गुजर ग​ई! कब सँध्या आकर , अपना,आँचल समेटकर, चली ग​ई! कब निशा अपना , चाँद​-तारों से सजा, आँचल फैलाये आ गयी! और कब , वापिस चली गयी, हमें कुछ खबर नहीं! भौंर की उजली किरण ने, मन के द्वार पर , हौले से दस्तक दी! उसकी नर्म गरमाहट​, जैसे ख्बाब से जगा गयी! ...राधा श्रोत्रिय​"आशा"

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