***** ख्बाब *****
आज फिर एक और साँझ,
तुम्हारे इंतजार ,
मैं गुजर गई!
कब सँध्या आकर ,
अपना,आँचल समेटकर,
चली गई!
कब निशा अपना ,
चाँद-तारों से सजा,
आँचल फैलाये आ गयी!
और कब ,
वापिस चली गयी,
हमें कुछ खबर नहीं!
भौंर की उजली किरण ने,
मन के द्वार पर ,
हौले से दस्तक दी!
उसकी नर्म गरमाहट,
जैसे ख्बाब से जगा गयी!
...राधा श्रोत्रिय"आशा"
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