शुक्रवार, 20 जून 2014

अंजान शख्स

**** अंजान शख्स ****

वो अंजान शख्स
 जिसे मैं,
ठीक से जानती,
 भी नही थी!
 इस कदर वो मेरे ,
दिलो-दिमाग​,
पर छा जायेगा!
मैनें कभी सोचा,
 भी न था!
उसकी बेताबी,जुनून ,
और दीवानगी!
इस तरह मुझे,
 विचलित कर देगी!!
इसकी मुझे,
कल्पना भी न थी!
रात चाँदनी मुझे,
जला रही थी!
 हवायें मखमली सा,
एहसास लिये मुझे,
छू-छूकर जा रही थीं
आकाश मैं,
टिमटिमाते तारे,
लग रहा था कि मुझे,
मुँह चिढ़ा रहे हैं!
नींद तो मेरी आँखों का,
रास्ता ही भूल गयी!
वो अंजान शख्स ,
मेरी आँखों से ,
ओझल होने का,
नाम  ही नहीं ले रहा!
मैं अकेले ही खुद से बात​,
करने लगी!
कहीं मुझे उससे प्यार तो,
नहीं हो गया ???
...राधा श्रोत्रिय​"आशा"
२१-०६-२०१४


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