******* कविता(३) *******
आज के दौर मैं,
डरी सहमी सी ,
खुद मैं ही खुद को,
खोज रही है
आज की कविता!
जो चिंतित है,
आज की नारि की भाँति,
अपनी अस्मिता की,
सुरक्षा को लेकर!
कब कौन उसके साथ ,
क्या सलूक कर बैठे!
और नवीनीकरण या,
बदलते दौर की कविता का,
नाम दे दे!
गर्भवती स्त्री की तरह,
झेलती हुई प्रसव वेदना को!
जो नहीं जानती,
क्या छुपा है उसके गर्भ मैं!
आज कविता भी,
गुजर रही है,
प्रसव पीडा के दौर से!
नहीं जानती वो,
क्या छुपा है,
उसके गर्भ मैं!
कोनसी रचना ,
नये रूप और नयी,
सोच के साथ ,
जन्मेगी उसके गर्भ से!
महक उठेगी फिर,
अपने वजूद के साथ,
आज की कविता!
...राधा श्रोत्रिय"आशा"
१६-०६-२०१४
This blog is for those who can turn out their feelings,expressions and thoughts through their own words and slight mixtures of imaginations and combinations with diferrent aspects and portions of lifeee......
रविवार, 15 जून 2014
कविता(३)
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