रविवार, 1 जून 2014

दिल के रिशते

***दिल के रिशते***
बड़े नाजुक होते हैं
ये दिल के रिशते,
काँच के माफ़िक !
जरा सा हाथ क्या फ़िसला,
चूर-चूर हो जाते हैं
जोडने की हर कोशिश ,
नाकाम हो जाती है !
बिखर कर रह जाती हैं,
उसकी किरचें !
पल भर की नाराजगी थी,
हमारी उनसे !
दिल के दरो-दीवार पर लगा,
कोई विस्फ़ोट सा हुआ है !
पल भर मैं बिखर रह गये,
सारे सपने ,उम्मीदें,ख्बाईशें,
बारूद की सी गंध
फ़ैल गयी हवा मैं !
लगा सियासत हो रही है,
रिशतो मैं भी !
समा गई हमारी सोच,
और साँसों मैं !
घुल गया जहर,
हमारी बातों मैं भी!
बड़े जतन से बुना था,
जिस रिश्ते को हमने,
चिथडे- चिथडे हो
बिखर गया,
खून हो गया उस रिशते का कल !
खून के छीटों से रंग गई दीवारें,
घर के कोनो मैं भी
आ गये कुछ धब्बे !
रिश्ते के टूटने की आवाज,
सुनी सबने !
पर दिल टूटा उसकी आवाज,
किसी के कानों तक न पहूँची !
रह गयी दबकर दिल मैं,
एक दबी घुटी सी चीख !
कितनी बार बहा,
दिल का लहु आँखों से !
लगा एक आध घाव,
हरा है अभी!
तलवार के घाव तो,
भर जाया करते हैं अकसर !
पर शब्दों के बाणों से लगे घाव,
रिसते रहते हैं ताउम्र !
एक टीस सी रह जाती है,
सालती रहती है !
बड़े नाजुक होते हैं ये
ये दिल के रिशते !
...राधा श्रोत्रिय"आशा"
१२-०३-२०१४

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