रविवार, 1 जून 2014

अमर-दास्ताँ

-------------अमर-दास्ताँ-------------
समय के पंख लगाके हमको उड़ना है,
तोड़ के सारे बंधन आगे बढ़ना है!
प्यार हमारा नहीं पल दो पल का,
है साथ हमारा ये जन्म-जन्म का!
क्यों होते हो खफ़ा तुम छोटी-छोटी ,
बातों पे!
जब मीलों का सफ़र साथ -साथ तय ,
करना है!
दुशमन है जमाना हमारी पाक ,
मोहब्ब्त का!
जमाने से बचकर अपना लक्ष्य हमें,
तय करना है!
आसाँन नहीं है इतनी जीवन की ये ,
ड़गर हमदम!
भूख,लाचारी ,बेरोजगारी बिखरी हुई,
हर कदम!
हमको भी इससे लड़कर आगे बढ़ ,
जाना है!
इक छोटा सा प्यार भरा घरोंदा अपना,
सजाना है!
"आशा"मोहब्बत का दुशमन क्यूँ ये ,
जमाना है!
हमको अपनी मोहब्ब्त की अमर दास्ताँ ,
बनाना हैं!
...राधा श्रोत्रिय"आशा"
२१-०२-२०१४

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