गुरुवार, 17 जुलाई 2014

******** बेखुदी *********
मैं तो जिधर देखती हूँ,
वो ही नजर,
 आते हैं मुझे!!
किस राह पर ले आयी है,
मेरी बेखुदी मुझे,
 उनसे जब नजरें मिलीं,
में मैं न रही!!
आँखें हैं उनकी, नजर ,
कुछ और ,
 आता नहीं है मुझे!
जरूरी नहीं ,
हर ख्वाईश दिल की.,
पूरी न हो!!
ये अलग बात है कि ,
उनको इसकी  खबर ,
तक न हो!!
भीगती रहीं रात भर ,
उनके इंतजार मैं ,
 मेरी आँखें!!
 चाँद के इंतजार मैं जैसे,
रात भर जागें,
 हों तारे!!
उनकी नजर का,
ये कैसा जादू है "आशा"
मेरी नजर भी अब ,
पहचानती नहीं मुझे !!
मैं तो जिधर देखती हूँ,
वो ही नजर,
 आते हैं मुझे!!
…राधा श्रोत्रिय”आशा”

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