बुधवार, 2 जुलाई 2014

*****सफ़र के दौरान(२ )******
इतनी लंबीं सूनसान राहों को ,
चीरतीं अनगिनत गाड़ियों,
के बीच भी!
कुछ दबी घुटी,
दर्द से कराहती आवाज़ें सुनी मैंनें!
जैसे कह रहीं थी कि,
काश किसी ने वक़्त पे,
मदद की होती!
तो आज हम भी इन राहों के,
हमसफ़र होते!
...राधा श्रोत्रिय​"आशा"

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