बुधवार, 2 जुलाई 2014

***** बदलते रिश्ते *****

***** बदलते रिश्ते *****

पल​-पल मैं बदलती हुई हमने,
यहाँ हर रिश्ते की तस्वीर देखी!

अपनेपन की चाहत मैं देखो,
खुद मैं ही उलझी  जिंदगी देखी!

कितना बे-मुरब्बत हो गया है,
देखो आज का हर इंसान यहाँ!

न जज्बातों का  कोई मोल है,
खिलवाड़ है हर एहसास यहाँ!

इंसानियत की कब्र खुदी है,
आँसू बहा रही, मानवता यहाँ!

ऊपर उठने की चाह मैं देखो ,
इंसान कुचल रहा, ईमाँन​ यहाँ!

हमने पल भर मैं, गढ़ती हुई,
हर रिश्ते की नयी तकदीर देखी!

अपनेपन की चाहत​ मैं देखो,
उलझी हुई हर जिंदगी देखी!

"आशा" किस पर करें यकींन​,
किसको कहें हम अपना यहाँ!

अपने-अपने स्वार्थ की खातिर​,
हमनें रिश्तों की न​ई तस्वीर देखी!

पल​-पल मैं बदलती हुई हमने,
यहाँ हर रिश्ते की तस्वीर देखी!

...राधा श्रोत्रिय​"आशा"
३-०७-२०१४

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