शुक्रवार, 4 जुलाई 2014

मेघ कब आओगे

***** मेघ कब आओगे ****** मेघ तुम कब आओगे , गरमी से हाल बेहाल है! तपती धरती को तुमसे, प्यार की गुहार है! सूना-सूना सा लगे अंबर​, धरती भी वीरान है! मेघ तुम कब आओगे , गरमी से हाल बेहाल है! बादलों की लेकर आड़, सूरज बना अंजान है! हवाओं ने भी देखो कि, बदली अपनी चाल है कहीं छुप कर देख रही, वो इंसान का हाल है! पेड़ों को काट-काट किया, प्रकृति पे अत्याचार है! कहीं हो रही झमा-झम, कहीं बोछार की दरकार है! मेघ तुम कब आओगे , गरमी से हाल बेहाल है! नयी सरकार का देखो ये, कैसा चमत्कार है! प्रकृति ने भी किया उससे,
साझा सा व्यवहार है!
मेघ तुम कब आओगे , गरमी से हाल बेहाल है! तपती धरती को तुमसे, प्यार की गुहार है! मन मैं उठता एक सवाल​, क्यूँ बार​-बार है! मँहगाई ने इतना क्यूँ, किया ये बबाल है! मैच फिक्सिंग से लगता, प्रकृति का सरोकार है! इंसानी रंग का इस पर भी, देखो चढ़ा खुमार है! रैन फिक्सिंग करके,कर रही, हिसाब की दरकार है! कहीं हो रही झमा-झम, कहीं बोछार की दरकार है! इंसान ने प्रकृति के सीने को, किया लहु- लुहान है! हरी-भरी धरती को किया, कांक्रीट का जाल है! बदलती दुनियाँ सा बदला, प्रकृति ने व्यवहार है! मेघ तुम कब आओगे , गरमी से हाल बेहाल है! अब भी सँभल जाओ कि, सबसे यही गुहार है! कहीं हो रही झमा-झम, कहीं बोछार की दरकार है! मेघ तुम कब आओगे , गरमी से हाल बेहाल है! तपती धरती को तुमसे, प्यार की गुहार है! ...राधा श्रोत्रिय​"आशा" ४-०७-२०१४
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