१६ दिसंबर को दिल्ली मे हुए सामुहिक दुष्कर्म के आरोपियों को कल अदालत मे फाँसी कि सज़ा सुनाई गई ।इस से निर्भया के माता पिता जो इतने महीनो से अपनी बेटी के साथ हुए घिनोने कृत्य और उसकी मृत्यु कि पीडा का दंश झेल रहे थे । उस से उन्हें कुछ राहत तो मिली होगी कि जिन राक्षसों ने उनकी बेटी के साथ इतना घिनोना कृत्य किया था वो इसी सज़ा के हकदार थे ।
पर क्या निर्भया की आत्मा को मुक्ती मिली होगी ??
क्योकी उसकी आत्मा के साथ उसकी देह को लहुलुहान करने वाला एक दरिन्दा अभी ज़िन्दा है
उसकी कम उम्र के कारन उसे बाल सुधार गृह मे रखा है !
पर मे पूँछती हूँ कि गुनाह की कोई उम्र होती हे क्या ???
जब उसने ये घिनोना कृत्य किया था तब उसके मन में बच्चा नहीं शैतान सवार था तो उसको भी वही
सजा मिलनी चाहिये जो बाकी दरिन्दों को मिली .
अब सबाल ये उठता हे कि इस तरह के दोषियों को फाँसी की सजा मिलने से इस तरह की घटनायें
होना बंद हो जायेंगी .
क्या हमारी माँ.बहिन.बेटियाँ सुरक्षित हे वो खुली हवा में आजादी की साँस ले सकती हें क्या लडकी
होना उनका कसूर हे ???
और अगर हे तो समाज में पुरूषों के लिये भी कोई स्थान नहीं होना चाहिये . क्योकि अगर लडकी
होना कसूर हे तो उससे भी बडा कसूर हे लडके को जन्म लेने देना .
लडके को जन्म देने वाली औरत पहले एक लड्की ही होती हे .बाद में वो किसी की पत्नी फिर माँ बनती हे .आज हमारा देश हर क्षेत्र में इतनी तरक्की कर रहा हे .
अगर कुछ नहीं बदला हे तो वो हे पुरुषों की मानसिकता उनका अंह उन्हें लगता हे कि औरत उनसे आगे
न निकल जाये .
आज के इस दौर में जब महिलायें इतनी सशक्त हो चुकी हे.हर क्षेत्र मे पुरुषों की बराबरी कर रही हे
बल्की उससे कहीं ज्यादा क्योकि अपने घर और बच्चों की जिम्मेदारी वो बखूबी निभा रही हे .
फिर भी उनके साथ ही क्यों गलत होता हे .मुझे लगता हे कि इसमे गलती हम औरतों की हे .जो कभी अपनी ताकत को पहचान ही नहीं सकी
क्योंकि बचपन से ही लडकियों को इतनी नसीहते दी जाती हें . ये मत करो वो मत करो .यहाँ मत जाओ ,ये कपडे नहीं पहनो उसे शुरू से ही इतने बंधनो मे बाधँ दिया जाता हे .कि वो खुलकर अपने विचारों की अभिव्य्क्ति नहीं कर पाती.
अगर उसको बचपन से ही उसकी शक्तीयों का परिचय कराया जाये कि तुम कमजोर नहीं तुम मे ही
दुर्गा हे जो स्वंय आदि शक्ती हे तभी तो नवरात्रि में कन्याओं के रुप मे तुम्हें पूजा जाता हे .और तुम मे
ही महाकाली का रूप भी हे .जो वक्त पडने पर दुष्टों का संहार भी करती हे .
तुममें सृजन की क्षमता हे एक नहीं दो-दो परिवारों की मर्यादाओं का निर्वाहन करती हो .ईशवर ने
तुम्हे अपार सहनशीलता प्रदान की हे .तुम कमजोर नहीं सशक्त हो .और साथ ही अपने बेटों को अच्छे संस्कार और शिक्षा दें उन्हें लडकियों की इजज्त करना सिखायें . उन्हें
बताया जाये कि उन्हें जन्म देने वाली माँ भी किसी की बहिन ,बेटी हे अगर वह किसी की लडकी के साथ गलत व्यवहार करता हे तो अपनी माँ का अनादर करता हे .
मेरा मानना हे कि अगर बच्चों को बचपन से ही संस्कार और सही शिक्षा दी जाये और एक स्वस्थ
वातावरण में उनकी परवरिश की जाये तो वो स्वस्थ मानसिकता से समृध और संस्कारों की दौलत से
परिपूर्न होगी .और हम एक स्वस्थ समाज की परिकल्पना को साकार होते हुए देख पायेंगे .
बेटा या बेटी दोनो ही माँ को प्राण-प्रिय होते हे .दोनो के जन्म की पीडा समान होती हे .कोइ भी माँ
अपनी कोख कलंकित करना नहीं चाहेगी .
बदलते वक्त के साथ चलने मे ही समझदारी हे .जिस दिन नारी के अंदर की औरत जागेगी और अब उसे
जागना ही पडेगा अपनी लडाई खुद लडने के लिये .और आज के हालातों को देखते हुए लगता हे कि वह समय बहुत दूर नहीं । जब नारी अपनी शक्तियों को पहचानकर अपने साथ हो रहे
अत्याचारों का बद्ला खुद लेगी ।
और इस पुरुष प्रधान समाज मे अपना वजूद स्थापित करेगी।ताकि फ़िर और किसी की निर्भया को पीडिता ना बनना पडे..
...राधा श्रोत्रिय"आशा"
पर क्या निर्भया की आत्मा को मुक्ती मिली होगी ??
क्योकी उसकी आत्मा के साथ उसकी देह को लहुलुहान करने वाला एक दरिन्दा अभी ज़िन्दा है
उसकी कम उम्र के कारन उसे बाल सुधार गृह मे रखा है !
पर मे पूँछती हूँ कि गुनाह की कोई उम्र होती हे क्या ???
जब उसने ये घिनोना कृत्य किया था तब उसके मन में बच्चा नहीं शैतान सवार था तो उसको भी वही
सजा मिलनी चाहिये जो बाकी दरिन्दों को मिली .
अब सबाल ये उठता हे कि इस तरह के दोषियों को फाँसी की सजा मिलने से इस तरह की घटनायें
होना बंद हो जायेंगी .
क्या हमारी माँ.बहिन.बेटियाँ सुरक्षित हे वो खुली हवा में आजादी की साँस ले सकती हें क्या लडकी
होना उनका कसूर हे ???
और अगर हे तो समाज में पुरूषों के लिये भी कोई स्थान नहीं होना चाहिये . क्योकि अगर लडकी
होना कसूर हे तो उससे भी बडा कसूर हे लडके को जन्म लेने देना .
लडके को जन्म देने वाली औरत पहले एक लड्की ही होती हे .बाद में वो किसी की पत्नी फिर माँ बनती हे .आज हमारा देश हर क्षेत्र में इतनी तरक्की कर रहा हे .
अगर कुछ नहीं बदला हे तो वो हे पुरुषों की मानसिकता उनका अंह उन्हें लगता हे कि औरत उनसे आगे
न निकल जाये .
आज के इस दौर में जब महिलायें इतनी सशक्त हो चुकी हे.हर क्षेत्र मे पुरुषों की बराबरी कर रही हे
बल्की उससे कहीं ज्यादा क्योकि अपने घर और बच्चों की जिम्मेदारी वो बखूबी निभा रही हे .
फिर भी उनके साथ ही क्यों गलत होता हे .मुझे लगता हे कि इसमे गलती हम औरतों की हे .जो कभी अपनी ताकत को पहचान ही नहीं सकी
क्योंकि बचपन से ही लडकियों को इतनी नसीहते दी जाती हें . ये मत करो वो मत करो .यहाँ मत जाओ ,ये कपडे नहीं पहनो उसे शुरू से ही इतने बंधनो मे बाधँ दिया जाता हे .कि वो खुलकर अपने विचारों की अभिव्य्क्ति नहीं कर पाती.
अगर उसको बचपन से ही उसकी शक्तीयों का परिचय कराया जाये कि तुम कमजोर नहीं तुम मे ही
दुर्गा हे जो स्वंय आदि शक्ती हे तभी तो नवरात्रि में कन्याओं के रुप मे तुम्हें पूजा जाता हे .और तुम मे
ही महाकाली का रूप भी हे .जो वक्त पडने पर दुष्टों का संहार भी करती हे .
तुममें सृजन की क्षमता हे एक नहीं दो-दो परिवारों की मर्यादाओं का निर्वाहन करती हो .ईशवर ने
तुम्हे अपार सहनशीलता प्रदान की हे .तुम कमजोर नहीं सशक्त हो .और साथ ही अपने बेटों को अच्छे संस्कार और शिक्षा दें उन्हें लडकियों की इजज्त करना सिखायें . उन्हें
बताया जाये कि उन्हें जन्म देने वाली माँ भी किसी की बहिन ,बेटी हे अगर वह किसी की लडकी के साथ गलत व्यवहार करता हे तो अपनी माँ का अनादर करता हे .
मेरा मानना हे कि अगर बच्चों को बचपन से ही संस्कार और सही शिक्षा दी जाये और एक स्वस्थ
वातावरण में उनकी परवरिश की जाये तो वो स्वस्थ मानसिकता से समृध और संस्कारों की दौलत से
परिपूर्न होगी .और हम एक स्वस्थ समाज की परिकल्पना को साकार होते हुए देख पायेंगे .
बेटा या बेटी दोनो ही माँ को प्राण-प्रिय होते हे .दोनो के जन्म की पीडा समान होती हे .कोइ भी माँ
अपनी कोख कलंकित करना नहीं चाहेगी .
बदलते वक्त के साथ चलने मे ही समझदारी हे .जिस दिन नारी के अंदर की औरत जागेगी और अब उसे
जागना ही पडेगा अपनी लडाई खुद लडने के लिये .और आज के हालातों को देखते हुए लगता हे कि वह समय बहुत दूर नहीं । जब नारी अपनी शक्तियों को पहचानकर अपने साथ हो रहे
अत्याचारों का बद्ला खुद लेगी ।
और इस पुरुष प्रधान समाज मे अपना वजूद स्थापित करेगी।ताकि फ़िर और किसी की निर्भया को पीडिता ना बनना पडे..
...राधा श्रोत्रिय"आशा"
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