शुक्रवार, 15 अगस्त 2014

गुलाब

********गुलाब  ********
टहनी पर कैसा इठलाये,
फूलों का वो राजा कहलाये!
प्रकृति की गोद मैं लहलहाये,
गगन की छाँव तले  सो जाये!
बंद कली मैं दिल  चुराये,
खिल जाये तो मन महकाये!
शोख हवा के झोंके सहलाये,
खुशबू चहुँ ओर बिखरायें!
प्रीतम की वो याद दिलायेे,
मन मैं दबी  उमंगें जगाये!
ओस गिरकर उसको नहलाये ,
तरोताजा  उसे वो कर जाये!
हवा का चंचल झोंका आये,
पल भर में उसको बिखरा जाये!
समझता क्यूँ नहीं ये इन्सान​,
पेड,पौधों,फूलों में भी होती जान​!
खुश हैं वो प्रकृति की छाँव में,
सोते हैं - खुले गगन की बाँहों मैं!
न तोडो उन्हें खुश हैं वो अपनी दुनियाँ मै..
दूर रखो कृतिमता से उन्हे जो हमें पवित्र ...
सुगंध दे मन को सच्ची खुशी पहुँचाते हैं...
हम मानव शाख से जुदा कर उन्हें घाव ही...
पहुँचाते हैं...
...राधा श्रोत्रिय​"आशा"
१६-०८-२०१४

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