******* बदलता - मंज़र ********
जहाँ मैं हर बंदा एक दूसरे के,
लहू का प्यासा ,
इस तरह का दौर ऐ मेरे खुदा,
जहाँ मैं क्यों हैं !
न दुआ है किसी के लवों पर न,
आँखों मैं दया है!
ज़ख्म,हरदिल मैं हाथों मैं खंज़र,
मेरे खुदा क्यों हैं !
कोई नहीं जानता कल क्या हो ,
फिर भी देखो!
खुद को महान समझता यहाँ,
हर इंसान क्यों है!
"आशा" ये किस तरह का मंजर,
है हर तरफ़ बिखरा!
बेटियों की आबरू असुरक्षित,
इस जहाँ मैं क्यों हैं!
ये केसा जश्न-ऐ-आज़ादी है ,
खौफ़ दहशत से भरा!
इस तरह का दौर ऐ मेरे खुदा,
वतन मैं क्यों हैं !
कहते हैं ज़र्रे-ज़र्रे मैं खुदा तू,
ही समाया!
हर इसाँन के दिल मैं इतनी,
नफ़रत फ़िर क्यों हैं !
जहाँ मैं हर बंदा एक दूसरे के,
लहू का प्यासा ,
इस तरह का दौर ऐ मेरे खुदा,
जहाँ मैं क्यों हैं !
...राधा श्रोत्रिय"आशा"
१४-०८-२०१४
जहाँ मैं हर बंदा एक दूसरे के,
लहू का प्यासा ,
इस तरह का दौर ऐ मेरे खुदा,
जहाँ मैं क्यों हैं !
न दुआ है किसी के लवों पर न,
आँखों मैं दया है!
ज़ख्म,हरदिल मैं हाथों मैं खंज़र,
मेरे खुदा क्यों हैं !
कोई नहीं जानता कल क्या हो ,
फिर भी देखो!
खुद को महान समझता यहाँ,
हर इंसान क्यों है!
"आशा" ये किस तरह का मंजर,
है हर तरफ़ बिखरा!
बेटियों की आबरू असुरक्षित,
इस जहाँ मैं क्यों हैं!
ये केसा जश्न-ऐ-आज़ादी है ,
खौफ़ दहशत से भरा!
इस तरह का दौर ऐ मेरे खुदा,
वतन मैं क्यों हैं !
कहते हैं ज़र्रे-ज़र्रे मैं खुदा तू,
ही समाया!
हर इसाँन के दिल मैं इतनी,
नफ़रत फ़िर क्यों हैं !
जहाँ मैं हर बंदा एक दूसरे के,
लहू का प्यासा ,
इस तरह का दौर ऐ मेरे खुदा,
जहाँ मैं क्यों हैं !
...राधा श्रोत्रिय"आशा"
१४-०८-२०१४
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें