गुरुवार, 14 अगस्त 2014

******* बदलता - मंज़र ********
जहाँ मैं हर बंदा एक दूसरे के,
लहू का प्यासा ,
इस तरह का दौर ऐ मेरे खुदा,
जहाँ मैं क्यों हैं !
न दुआ है किसी के लवों पर न​,
आँखों मैं दया है!
ज़ख्म,हरदिल मैं हाथों मैं खंज़र​,
मेरे खुदा क्यों हैं !
कोई नहीं जानता  कल क्या हो ,
फिर भी देखो!
खुद को महान समझता यहाँ,
हर इंसान क्यों है!
"आशा" ये किस तरह का मंजर,
है हर तरफ़ बिखरा!
बेटियों की आबरू असुरक्षित​,
इस जहाँ मैं क्यों हैं!
ये केसा जश्न​-ऐ-आज़ादी है ,
खौफ़ दहशत से भरा!
इस तरह का दौर ऐ मेरे खुदा,
वतन​ मैं क्यों हैं !
कहते हैं ज़र्रे-ज़र्रे मैं खुदा तू,
ही समाया!
हर इसाँन के दिल मैं इतनी,
नफ़रत  फ़िर क्यों हैं !
जहाँ मैं हर बंदा एक दूसरे के,
लहू का प्यासा ,
इस तरह का दौर ऐ मेरे खुदा,
जहाँ मैं क्यों हैं !
...राधा श्रोत्रिय​"आशा"
१४-०८-२०१४

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