रविवार, 31 अगस्त 2014

******* दर्द की इंतहा ********

******* दर्द की इंतहा ********
दर्द की इंतहा से,
पिघलने लगी हैं अब रातें भी,
शायद अँधेरा रात को डसने लगा है------
न जाने कितनी ही मासूम​,
जो बिना किसी कसूर ,
हैवानियत की शिकार हो
दम तोड चुकीं हैं-----
इनकी रूहें बैचेन हो,
रात के अँधेरे में भटकती हैं सड़को पर​,
चीर रात के सन्नाटे को ,
पुकारती हैं न्याय के देवता को---------
जिसने आँखों पर पटटी बाँध रखी है,
अँधेरे मैं ही सुन ले ,
वो इन मासूमों की दर्द भरी दास्ताँ--------
जीते जी तो,न बोल सकी,
ड़रा धमका खरीद लिया गया,
इनके परिवार की,लाचारी को,
 और कुछ पैसों से बंद करवा दिये गये
मुँह इनके -----
पर बैखौफ,आजाद हैं अब ये,
 डरती नहीं हैं,अपने साथ हुये,
अन्याय का हिसाब,चुकाना है इन्हें,
तब ही सुकून पायेंगी रूह इनकी------
रात में जब ड़राता है ,
खुद का भी साया!
पेड़ों के चलते से साये,
चौंका से देते हैं जब​-------
घबराकर,अपनी तन्हाई से,
सुनती हूँ,सन्नाटों की सदायें,
कहीं कुछ ,घटता है,भीतर मेरे मन के,
 शायद सालों से सोई हुई लड़की,
जाग जाती है ------
हो जाती है,इन रूहों के साथ​,
जलाती है,एक दिया उम्मीद का,
 इनकी अँधेरी राहों में,
इनकी मुक्ती की कामना कर ---------
घनी काली,अमावस की सी रातें,
जो समाज के,ठेकेदारों ने दी हैं इन्हें,
नयी सुबह किसी कोख में,
खोलेगीं आँखें ये मासूम रूहें,
बन आशायें----------
आओ हम सब मिलकर इनकी अँधेरी राहों में,
एक दिया उम्मीद जलायें--------
हमारी एक कोशिश कितनी मासूमों की जिंदगी,
बदल सकती हैं....
अपनी बेटियों को बचाना है अगर इन भेडियों से,
खुद अपना कानून बनायें---------
जो दृष्टी इनकी अस्मत पे उठे खत्म करदें,निस्तानाबूद करदें----
हम भी तो देखें हौंसला इन दरिन्दों का कब तक ये जहरीले नाग ,
अपना फन उठाते हैं,जब इन्हें कुचल इनके असतित्व को मिटा दिया जायेगा,
तो दूसरा कोई इस तरह की हिम्मत नहीं कर पायेगा---------
बेटियों की सुरक्षा की खातिर हम मज़हब ,जाति-पाति का भेद भुला एक हो जायें----
ताकि हमारी नन्हीं कलियाँ खिल- खिलाती रहें--------
...राधा श्रोत्रिय​"आशा"
३१-०८-२०१४

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