******* हरे जख्म **********
लाख कोशिशें कि ,
थक गयी!
बडी ही ढ़ीठ निकली यादें तुम्हारी,
मन -मष्तिष्क में कुछ इस तरह बस गयी हैं,
कि जाने का नाम ही नहीं लेती!
अब आँखों में ठहरी नमीं कि वजह से,
पोषित हो रही हैं!
काई सी जम आयी है,
मन के धरातल पर !
जैसे ही उतरने की कोशिश करती हूँ,
फ़िसलन सी महसूस होती है!
बमुश्किल संभलते-संभलते भी,
गिर ही जाती हूँ!
तुम्हारी यादों के गहरे दल-दल में,
सालों सहेजते -सहेजते जो ,
तब्दील हो गयी,
मुशकिल होती है थाह पाना मन की!
कुछ दिन साथ होते हम ,
तो हुमारे एहसासों की धूप से,
खिली रहती ये!
महकती और महकाती अपनी,
चंदन सी पवित्र खुशबू से दुनियाँ जहाँ को!
पर यहाँ तो मज़हबी पहरे है प्यार पर ,
खुलकर साँस भी नहीं ले पाती,
दम तोड देती!
अच्छा है सीलन और नमीं से ,
हरी हो गयीं!
उठने की कोशिश मैं,
फ़िर गिर जाती हूँ!
आ जाते है निशाँन ,
तन के साथ मन पर भी!
बहुत गहरे तक महसूस होती है छिलन,
खूँन रिसता तो दर्द का एहसास ,
औरों को भी महसूस होता !
पर ये हरे जख्म गहरे होते हैं,
लाल से कहीं ज्यादा!
भरते नहीं ताउम्र रिसते रहते हैं,
न सूखते न मिटते ,
पोषित होते रहते हैं,
आँखों की नमी से ताउम्र हरे रहते हैं ये,
हरे जख्म!
...राधा श्रोत्रिय"आशा"
१३-०९-२०१४
लाख कोशिशें कि ,
थक गयी!
बडी ही ढ़ीठ निकली यादें तुम्हारी,
मन -मष्तिष्क में कुछ इस तरह बस गयी हैं,
कि जाने का नाम ही नहीं लेती!
अब आँखों में ठहरी नमीं कि वजह से,
पोषित हो रही हैं!
काई सी जम आयी है,
मन के धरातल पर !
जैसे ही उतरने की कोशिश करती हूँ,
फ़िसलन सी महसूस होती है!
बमुश्किल संभलते-संभलते भी,
गिर ही जाती हूँ!
तुम्हारी यादों के गहरे दल-दल में,
सालों सहेजते -सहेजते जो ,
तब्दील हो गयी,
मुशकिल होती है थाह पाना मन की!कुछ दिन साथ होते हम ,
तो हुमारे एहसासों की धूप से,
खिली रहती ये!
महकती और महकाती अपनी,
चंदन सी पवित्र खुशबू से दुनियाँ जहाँ को!
पर यहाँ तो मज़हबी पहरे है प्यार पर ,
खुलकर साँस भी नहीं ले पाती,
दम तोड देती!
अच्छा है सीलन और नमीं से ,
हरी हो गयीं!
उठने की कोशिश मैं,
फ़िर गिर जाती हूँ!
आ जाते है निशाँन ,
तन के साथ मन पर भी!
बहुत गहरे तक महसूस होती है छिलन,
खूँन रिसता तो दर्द का एहसास ,
औरों को भी महसूस होता !
पर ये हरे जख्म गहरे होते हैं,
लाल से कहीं ज्यादा!
भरते नहीं ताउम्र रिसते रहते हैं,
न सूखते न मिटते ,
पोषित होते रहते हैं,
आँखों की नमी से ताउम्र हरे रहते हैं ये,
हरे जख्म!
...राधा श्रोत्रिय"आशा"
१३-०९-२०१४
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